श्री रघुनाथ कथा : परमात्मा की आत्यात्मिक कृपा जिस पर होती है वही सत्संग में लीन हो जाता है

 

मोहम्मदाबाद फर्रूखाबाद। गांव सहसपुर में चल रही श्री रघुनाथ कथा के पंचम दिन कथा व्यास प्रेममूर्ति पूज्य सन्त श्री प्रेमभूषण जी महाराज ने अपने मुख से कहा क्रियात्मकता सर्वकाल उपस्थित रहना चाहिये, जो जीव क्रियात्मक है वही जीवन्त है। किसी कार्य की असफलता इस बात का द्योतक है कि कार्य को पूरे मनोयोग से नहीं किया गया है। सन्त प्रेमभूषण जी ने कहा कि विश्राम वहीं पर मिलता है, जहाँ मन की अनुकूलता हो, भगत का विश्राम केवल भजन है। उन्होंने कहा कि योगी जनक की वाटिका इतनी शोभायमान है, कि परमात्मा उस वाटिका को देखने पुष्प उतारने हेतु पधारते है।

परमात्मा की आत्यात्मिक कृपा जिस पर होती है वही सत्संग की ओर पग रखता है। सन्त प्रेमभूषण जी ने कहा कि पति-पत्नी एक इकाई है दो है ही नहीं दोनों एक है। अतिसय प्रेम में संसय बना ही रहता है। मूर्ति का मुस्कराना मंगल होता है, मूर्ति का रोना अमंगल का भी अमंगल होता है। सुन्दरता जीव के सत्कर्मो का प्रतिफल है। जितना प्रेम आपका उससे है, उसका भी प्रेम उतना ही है। प्रेम में और आक्रोश में क्रिया का लोप हो जाता है।

सन्त श्री प्रेमभूषण जी महाराज ने सीता राम के विवाह महोत्सव का वर्णन करते हुये कहा कि मां मैया के पास आयी कुशल दी पुष्प दल लेकर सरकार भैया के साथ गुरूशरण में आये और भाइयों को आशीर्वाद दिया। चन्द्रमा का दर्शन है मां के स्वरूप का स्मरण है लक्ष्मण भइया का आनन्द है। रात्रि विश्राम प्रातः काल जनक महाराज ने सदानन्द जी से निवेदन किया ऋषिदेव राजपुत्रों को साथ लेकर स्यंवर स्थल आये उनको देखकर सब तरह-तरह की बातें करने लगे जो कपटी राजा आये थे वह डरकर बैठे रहे अब सखिया माता को लेकर आयी सीता मैया आ गयी माता के पास आकर बैठ गयी। जो भी राजा आये थे उन लोगों से धनुष तोड़ने के लिए बोला गया कि जो धनुष तोड़ेगा वही मेरी पुत्री का वरण करेगा।

एक-एक करके राजा धनुष तोड़ने के लिए आने लगे पर धनुष तोड़ना तो दूर वह धनुष को तिल मर भी हिला न सके। मुझे अगर यह पहले पता होता कि पृथ्वी वीरों से खाली है तो मैं यह संकल्प नहीं लेता। तभी लक्ष्मण जी की त्योरी चढ़ गयी और वह जनक जी की ओर देखते हुये बोले कि जिस सभा में रघुवंशी कुल का एक भी व्यक्ति बैठा हो वहाँ ऐसी बातें शोभा नहीं देती मैं अपने प्रभू के नाम लेकर अभी इस धनुष को छिन्न भिन्न किये देता हूँ। जनक जी ने जिन शब्दों का प्रयोग किया है वह अनुचित है।

लक्ष्मण जी आवेश में भी भगवान का भरोसा नहीं छोड़ते हैं। उन्होंने कहा कि जो भी बोला है वह आप के ही भरोसे करूंगा तभी गुरूदेव ने भगवान राम को आदेश दिया कि उठो राम इस धनुष को तोड़कर महाराजा जनक का संताप मिटाओ तभी आदेश पाकर भगवान राम ने गुरूदेव को प्रणाम कर धनुष को उठा लिया लिया। भगवान राम के स्पर्श मात्र से ही धनुष टूट गया। यह देखकर सभी चकित रह गये। जयमाल की तैयारियां होने लगी। सखिया प्रणाम करने को कहती है माता को संकोच होता है। भगवान का आगमन होता है।

सन्त प्रेमभूषण जी महाराज ने कथा का वर्णन करते हुये बताया कि हमारे ऋषियों द्वारा जीव के जन्म से लेकर मृत्यु तक के विषय में अपार चिंतन का परिणाम ही पुराण है। अधिकार की लालसा ही कर्त्तव्य को समाप्त कर देती है। हमारे सत्कर्माे के अनुसार ही प्रकृति हमारा सहयोग करती है।

कथा के बाद मुख्य यजमान डॉ0 अनुपम दुवे एडवोकेट ने अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मीनाक्षी दुवे, ब्लाक प्रमुख अमित दुवे ‘बब्बन’, अनुराग दुवे ‘डब्बन’ अभिषेक दुवे, सीतू दुवे एवं परिवार के साथ आरती उतारी। भक्तों को प्रसाद वितरण किया गया। इस मौेके पर सत्यव्रत पाण्डेय,

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