श्री रघुनाथ कथा : महाराज बोले- कृपा मांगने से नहीं मिलती, करनी पड़ती है अनुभूति

 

मोहम्मदाबाद फर्रूखाबाद। गांव सहसपुर में चल रही श्री रघुनाथ कथा के छठे दिन कथा व्यास प्रेममूर्ति पूज्य सन्त श्री प्रेमभूषण जी महाराज ने कहा कि जब ते राम व्याहि घर आये। नित नव नूतन मोध बधाये। असत्य से ज्यादा दिन नहीं जिया जा सकता है। सत्य से ही ज्यादा खुशी और आनन्द से जिया जा सकता है। उन्होंने कहा अधिकार अधिकार का त्याग करना कोई सरल काम नहीं है। कर्त्तव्य से अधिकार की प्राप्ति होती है। जो धर्म पथ पर चलेगा उसी को वैराग्य होता है। धर्म भगवान का शाश्वत स्वरूप है। शुभ कार्य तुरन्त करना चाहिये, कल पर नहीं टालना चाहिये। सेवा करने से ताप समाप्त होता है। किसी श्रेष्ठ कार्य में विलम्ब नहीं होना चाहिये। हमारा सौभाग्य का दूसरा कोई वर्णन नहीं कर सकता।

यह तो स्वयं को अनुभूति करना चाहिये। कैकैयी मां राष्ट्र जननी है। स्वार्थ का विस्तार ही परमार्थ है। स्वार्थ जब समुचित होता है तो वह जगत का और स्वयं का नुकसान करता है। परमार्थ की साक्षात प्रतिमूर्ति है। उन्होंने कहा राम जी जब भी परमार्थ का अवसर आये तो सब कुछ भूलकर परमार्थ पहले करना चाहिये। भक्त की निष्ठा भगवान के प्रति जितनी होती है। उतनी ही निष्ठा भगवान की भक्त के प्रति होती है। पुण्य बढ़ने से भक्ति दृढ़ होती है।

सन्त प्रेमभूषण जी महाराज ने रामवन एवं केवट प्रेम का वर्णन करते हुये आगे कहा। हमको हमारे को कहना नहीं समझ लेना है। भगवान ने वर के आधीन वरवस वर के आधीन होकर तात श्री सुमन्त को समझा बुझाकर विदा किया। अपने प्रभु गंगा मां के तट पर आये भक्तराज केवट भगवान की प्रतीक्षारत थे क्योंकि केवट जान गये थे कि रामजी ब्रह्म है यह जान गये थे जो कुछ कमाल है, लीला है, मूरि है, वह सब है। वह पावै में वह केवट जी जान गये, मान गये, तान गये, ठान गये कि रामजी के यदि पाव धोकर पी लिया जाये तो उद्वार हो सकता है।

व्यवस्थाये  बहस के लिये नहीं तर्क के लिये नहीं है। उन्होंन कहा कि पुण्य बड़ाने में दिमाग न लगाया जाये कृपा मांगने से नहीं मिलती है। इसकी अनुभूति करनी पड़ती है। सत्संग में कौन जाता है जिस पर अति हरि कृपा होती है वह जाता है। महाराज जी ने कहा कि भगवान जानते है कि केवट हमको परमात्मा मानते है। भगतराज केवटराज की वाणी सुनकर भगवान को कुछ कहना था कि ऐ भइया निशाद जी यह नहीं सुनते है तो दूसरी नाव मंगा लो तो केवटराज ने ना कहा भगत के जीवन की साधना को देखकर भगत के हृदय की भावना को देखकर भगवान भी आ गये घाट पर तब तक खड़ा होना पड़ेगा जब तक भगत नहीं चाहता केवट जी की यह निष्ठा है कि पाव धोकर ही पार ले जाये।

भगवान बोले नहीं केवट को लगा कि चड़ाई, उतराई नहीं है इनके पास। तो भगतराज ने कहा पैर धोऊँगा नाव चड़ाऊँगा उतराई की कोई कामना नहीं। आप विश्वास करे तो ठीक आप विश्वास न करें तो ठीक नहीं तो आप मार्यादा के अवतार मर्यादा की सौगन्ध लेता हूँ। इस पर भी विश्वास न हो तो सत्यव्रती महाराज आपके पिता जी की सौगन्ध लेता हूँ सब सही कह रहा हूँ। यह सब सुनकर प्रभु हंसे यह सोचकर कि यह कह रहे हमें कुछ नहीं चाहिये।

महाराज जी ने कहा कि भगवान से चाहिये मत से हमारे कर्म अच्छे सच्चे होंगे। हम सत्कर्म कर रहे होंगे। हम धर्मशील रहेगे। हम पुण्यशाली रहेंगे तो उसी प्रकार भगवान सब कुछ प्रदान कर देंगे। जिस प्रकार दिव्य उर्वरा भूमि हो खेत में बीज डाल देते ही फसल लह लहा उठती है। भगवान अपने किसी भी भक्त के द्वारा किये गये किसी भी कर्म के फल को दिये बगैर रहते ही नहीं।

कथा के बाद मुख्य यजमान डॉ0 अनुपम दुवे एडवोकेट ने अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मीनाक्षी दुवे, ब्लाक प्रमुख अमित दुवे ‘बब्बन’, अनुराग दुवे ‘डब्बन’ अभिषेक दुवे, सीतू दुवे एवं परिवार के साथ आरती उतारी। भक्तों को प्रसाद वितरण किया गया। इस मौेके पर दीपा अवस्थी चेयरमैन पाली, कमलकान्त बाजपेई पूर्व चेयरमैन पाली, बबलू पाण्डेय, राकेश मिश्रा, कैलाश मिश्रा, रवीश द्विवेदी, मुन्ना बासनेय, कृपाशंकर शुक्ला, नवीन मिश्रा, मनोज दुवे बेबर, अजीत पाण्डेय, अजय द्विवेदी, अनिल तिवारी प्रधान, भोले मिश्रा पाली आदि लोग उपस्थित रहे।

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