आलू, गेंहू, सरसों, गन्ना फसल की बीमारियों का कैसे करें उपचार

फर्रुखाबाद। (एफबीडी न्यूज़) तापमान की उथल-पुथल के कारण रवि सीजन की फसलों में बीमारियां लग गई है। जिला कृषि अधिकारी सतीश कुमार ने मुख्य फसलों की बीमारियों के उपचार की जानकारी किसानों को दी है। उन्होंने बताया कि जिले में रबी सीजन में मुख्यतः आलू, गेंहू, सरसों, गन्ना, चना, मटर, मसूर एवं आलू प्रमुख फसलें हैं । वर्तमान मौसम में तापमान में उतार-चढ़ाव के कारण फसलों में लगने वाले सामयिक कीट-रोग के प्रकोप की सम्भावना के द्रष्टिगत बचाव एवं प्रबंधन हेतु कृषकों को फसलवार सुझाव एवं संस्तुतियां दी जा रही हैं जो निम्न प्रकार हैं।

धान्य फसलेंः-

गेहूँ-

1. गेंहू में खरपतवार नियंत्रण हेतु 20-25 दिन पर खुरपी या कुदाल से निराई-गुड़ाई कर दें। गेंहुसा एवं जंगली जई के रासायनिक नियंत्रण हेतु सल्फोसलपयुरान 75%WG की 33 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 400 ली० पानी में घोलकर बुवाई के 20-25 दिन के बाद छिडकाव करें। चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु मेटसल्फ्युरान मिथाइल 20%WP 20 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर 500ली० पानी में घोलकर बुवाई के 20-25 दिन के बाद छिडकाव करना चाहिए।

2. दीमक / गुझिया का प्रकोप दिखने पर व्युवेरिया बेसिआना की 2.5 किग्रा० मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 ली० पानी में मिलाकर सांयकाल छिडकाव करें। रासायनिक नियंत्रण हेतु क्लोरपायरीफॉस 20%EC की 2.5 ली० मात्रा को सिचाई के पानी के साथ प्रयोग करें।

3. माहू का प्रकोप दिखने पर क्युनालफास 25% EC की 1 ली० मात्रा को लगभग 700 ली० पानी में घोलकर छिडकाव कर देने से कीट का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। जैविक नियंत्रण हेतु माहू के प्राकृ तिक शत्रु कीट क्राईसोपर्ला कार्निया का फसल वातावरण में संरक्षण करना चाहिए।

4. काली एवं भूरी गेरुई रोग के नियंत्रण हेतु मैंकोजेब 75% अथवा जिनेब 75% की 2 किग्रा मात्रा को 600 ली० पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए।

5. पीली गेरुई के प्रकोप की दशा में प्रोपिकोनाजोल 25% EC की 500 मिली मात्रा को 600-700ली० पानी में घोलकर छिडकाव करें।

तिलहनः-

सरसों/राई-

1. बथुआ, कृष्णनील, हिरनखुरी, जंगली चौलाई आदि के नियंत्रण हेतु पेंडीमेथालिन 38.7% CS 875 मिली० प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 2-3 दिन के अन्दर प्रयोग करें।

2. माहू का प्रकोप होने पर ऑक्सीडिमेटान मिथाइल 25% EC की 1 लीटर मात्रा अथवा इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL की 250 मिली मात्रा को 600-700 ली० पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए। माहू के नियंत्रण हेतु येलो स्टिकी ट्रैप को खेत में लगा देने से इसका प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता लें

3. आरा मक्खी के नियंत्रण हेतु क्युनालफास 25% EC की 1.2 लीटर मात्रा को लगभग 700 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव कर देने से कीट का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है।

4. आल्टरनेरिया पत्ती धब्बा के नियंत्रण हेतु इप्रोडियान 50% WP की 2.5-3 किग्रा० मात्रा प्रति हेक्टेयर 700 ली० पानी में घोलकर छिडकाव करें।

5. तुलासिता एवं सफेद गेरुई रोग के नियंत्रण हेतु मेटालेक्जिल 4%+मैंकोजेब 64% WP कि 2.5 किग्रा० मात्रा को प्रति हेक्टेयर लगभग 1000 ली० पानी में घोलकर छिड़काव करें।

दलहन

चना/मटर/मसूर-

1. बथुआ, सेंजी, कृष्णनील, हिरनखुरी, गजरी, खरतुआ आदि इन फसलों के प्रमुख खरपतवार हैं। खरपतवारनाशी रसायन द्वारा नियंत्रण हेतु पलूक्लोरालिन 45% EC की 2.2 ली० मात्रा प्रति हे० 800 ली० पानी में घोलकर बुवाई के तुरंत पहले मिटटी में मिला दें अथवा पेंडीमेथालिन 30% EC की 3.30 ली० मात्रा प्रति हे० उपरोक्तानुसार पानी में घोलकर बुवाई के 2-3 दिन के अन्दर समान रूप से छिडकाव करें।

फली बेधक कीट- इस कीट की सूंडियां हरे अथवा भूरे रंग की होती हैं। प्रारम्भ में कोमल पत्तियों को खुरचकर खाती हैं, बाद में बड़ी होने पर फलियों में छेद बनाकर दानो को खाती रहती हैं। एक सूंडी अपने जीवनकाल में 30-40 फलियों को प्रभावित कर सकती है।

प्रबंधन-

1. खेत के चारों और गेंदे के पौधे को ट्रैप क्रॉप के रूप में प्रयोग करना चाहिए।

2. फूल एवं फलियाँ बनते समय 5 गंधपाश प्रति हेक्टेयर की दर से निगरानी के लिए लगाना चाहिए।

3. चने की अगेती बुवाई (मध्य अक्टूबर) करने से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।

4. NPV (Ha) 2% ए०एस० 250-300 एल०ई० प्रति हे० की दर से लगभग 250-300 ली० पानी में घोलकर प्रयोग करने से इसका प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है।

5. 2 छोटी अथवा 1 बड़ी सूंडी प्रति 10 पौधा मिलने पर इसका रासायनिक नियंत्रण करना चाहिए। इस हेतु एथियन 50%EC की 1.2 ली० मात्रा प्रति हे० अथवा पलूवेंडामाइड 39.35% SC की 100 मिली मात्रा प्रति हे० की दर से 500-600 ली० पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए।

6. तना मक्खी के नियंत्रण हेतु कार्बोपयूरान 3%CG की 15 किग्रा० मात्रा प्रति हे० बुवाई से पूर्व मिट्टी में मिलानी चाहिए अथवा एजाडिरेक्टिन 0.15% EC की 2.5 ली० मात्रा को 500 ली० पानी में घोलकर प्रति हे० की दर से छिड़काव कर देना चाहिए।

7. उकठा रोग के नियंत्रण हेतु ट्राईकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किग्रा० बीज की दर से शोधित कर बुवाई करनी चाहिए अथवा ट्राईकोडर्मा की 2.5 किग्रा मात्रा प्रति हे0 60-75 किग्रा० गोबर की खाद में मिलाकर 8-10 दिन छाया में रखने के उपरांत बुवाई से पूर्व आखिरी जुताई के समय भूमि में मिला देनी चाहिए।

8. बुकनी रोग के नियंत्रण हेतु ट्राईडेमेंफोन 25% WP 1 ग्राम प्रति ली० पानी में घोलकर छिडकाव करें या टेबुकोनाजोल 50% + ट्राईपलोक्सीस्ट्रोबिन 25% WG की 350 ग्राम मात्रा प्रति हे0 500 ली० पानी में घोलकर छिडकाव करें।

गन्ना-

1. पायरिला कीट से बचाव हेतु इसके प्राकृतिक शत्रु एपीरेकेनिया मेलोनोल्युका का फसल वातावरण में संरक्षण किया जाना चाहिए। परजीवी कीट की पर्याप्त उपस्थिति में कीट की स्वतः रोकथाम हो जाती है। जैविक नियंत्रण हेतु ट्राईकोग्रामा के 50000 अंडे प्रति हे0 की दर से 10-15 दिन के अन्तराल पर प्रयोग करने चाहिए। रासायनिक नियंत्रण हेतु क्लोरपायरीफोस 20% EC की 1.5 ली० मात्रा प्रति हे० की दर से 800-1000 ली० पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए।

2. गन्ने में लेपिडोप्टेरा कुल के कीटों की रोकथाम के लिए लाइट ट्रेप का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।

3. लाल सडन रोग से बचाव हेतु रोगरोधी प्रजातियों का ही चयन करना चाहिए। स्यूडोमोनास फ्लोरिसेंस की 2.5 किग्रा० मात्रा प्रति हे० की दर से 80-100 किग्रा० गोबर की खाद में मिलाकर अंतिम जुताई के समय भूमि में मिला दें।

error: Content is protected !!